मदार का पौधा, जिसे अर्क, आक या स्वेतार्क भी कहा जाता है, आयुर्वेद में विशेष महत्व रखता है। इसका उपयोग प्राचीन काल से औषधीय प्रयोगों में किया जाता रहा है। यह पौधा दिखने में साधारण है लेकिन इसके पत्ते, फूल, दूध और जड़ में अनेक औषधीय गुण छिपे होते हैं। सही मात्रा और उचित विधि से इसका सेवन कई गंभीर रोगों में लाभकारी माना गया है।
1) मदार (Madar) के फायदे
- शरीर से विषैले तत्व बाहर निकालने में मदद करता है।
- त्वचा रोगों में उपयोगी माना गया है।
- कृमिनाशक (Anthelmintic) के रूप में कार्य करता है।
- भूख बढ़ाने और पाचन सुधारने में सहायक।
- दर्द और सूजन कम करने में मददगार।
- शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करता है।
2) किन-किन बीमारियों में काम आता है
आयुर्वेद में मदार का उपयोग इन रोगों के उपचार में बताया गया है:
- कुष्ठ रोग (Skin diseases)
- बवासीर (Piles)
- दमा और खाँसी
- कृमि रोग (Worm infection)
- जोड़ों का दर्द और सूजन
- ज्वर (Fever)
- दाँत दर्द और मुँह के रोग
3) यह कहाँ पाया जाता है
- मदार का पौधा पूरे भारत में पाया जाता है।
- यह सूखी और बंजर ज़मीन पर आसानी से उग जाता है।
- खेतों की मेड़ों, जंगलों और रास्तों के किनारे यह सामान्य रूप से मिल जाता है।
- राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और दक्षिण भारत में इसकी अधिकता है।
4) इसका उपयोग कैसे करें
- पत्तियों का लेप – पत्तों को गर्म करके सूजन वाले स्थान पर बाँधने से आराम मिलता है।
- दूध (Latex) – दाँत दर्द और बवासीर में सीमित मात्रा में उपयोग किया जाता है।
- जड़ का प्रयोग – जड़ का चूर्ण पेट के कीड़े निकालने और भूख बढ़ाने में सहायक।
- फूलों का प्रयोग – धार्मिक अनुष्ठानों के साथ-साथ इन्हें औषधीय प्रयोजनों में भी लिया जाता है।
- तेल बनाकर – मदार के दूध और तेल का मिश्रण त्वचा रोग और जोड़ों के दर्द में लगाया जाता है।
5) क्या-क्या परहेज करें
- मदार का दूध विषैला होता है, इसलिए डॉक्टर या आयुर्वेदाचार्य की देखरेख के बिना इसका सेवन न करें।
- गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को इससे परहेज करना चाहिए।
- अत्यधिक मात्रा में उपयोग करने से उल्टी, दस्त और पेट दर्द हो सकता है।
- आँख, नाक और संवेदनशील अंगों के संपर्क में इसका दूध न आने दें।
- स्वयं उपचार करने से पहले किसी योग्य वैद्य से सलाह अवश्य लें।
निष्कर्ष
मदार (Madar) का पौधा औषधीय दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसका उपयोग त्वचा रोग, बवासीर, दमा, कृमि रोग और सूजन जैसी समस्याओं में लाभकारी माना गया है। हालाँकि, यह पौधा विषैला भी है, इसलिए इसे बिना विशेषज्ञ की सलाह के प्रयोग नहीं करना चाहिए। सही विधि और मात्रा में किया गया प्रयोग रोग निवारण में सहायक हो सकता है।