बकाइन का पेड़, जिसे निमोली, मेला, महानेम (Melia azedarach) भी कहा जाता है, एक औषधीय वृक्ष है। यह नीम के समान दिखता है लेकिन इसके पत्ते, फूल और फल अलग होते हैं। आयुर्वेद में इसे अनेक रोगों के उपचार में उपयोगी माना गया है। इसकी छाल, पत्तियाँ, फल और बीज औषधीय गुणों से भरपूर होते हैं।
1) बकाइन (Bakain) के फायदे
- शरीर से विषैले तत्व निकालने में सहायक।
- कृमिनाशक गुणों से भरपूर।
- त्वचा रोगों में लाभकारी।
- भूख बढ़ाने और पाचन सुधारने में सहायक।
- सूजन और दर्द कम करने में मददगार।
- कीटाणुनाशक और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाला।
2) किन-किन बीमारियों में काम आता है
आयुर्वेद में बकाइन का उपयोग इन रोगों में बताया गया है:
- कृमि रोग (पेट के कीड़े)
- कुष्ठ और त्वचा रोग
- बुखार और मलेरिया
- जोड़ों का दर्द और गठिया
- दाँत और मसूड़ों की समस्या
- खाँसी और सांस संबंधी रोग
- कब्ज और अपच
3) यह कहाँ पाया जाता है
- बकाइन का पेड़ पूरे भारत में पाया जाता है।
- यह अधिकतर सूखी और उपजाऊ ज़मीन पर उगता है।
- गाँव, खेतों की मेड़ों और सड़कों के किनारे यह आसानी से दिखाई देता है।
- उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश और दक्षिण भारत में इसकी अधिकता है।
4) इसका उपयोग कैसे करें
- पत्तों का रस – त्वचा रोगों में लगाने और कृमि रोग में पीने के लिए उपयोग।
- छाल का काढ़ा – बुखार, पेट दर्द और पाचन समस्याओं में लाभकारी।
- फलों का चूर्ण – कृमिनाशक और पाचन सुधारने में सहायक।
- पत्तों का लेप – फोड़े-फुंसी और त्वचा रोगों पर लगाने से आराम।
- बीज का तेल – त्वचा रोग और कीड़े-मकोड़ों से बचाव के लिए उपयोग।
5) क्या-क्या परहेज करें
- बकाइन के फल और बीज का अधिक सेवन विषैला प्रभाव डाल सकता है।
- गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को इसका सेवन नहीं करना चाहिए।
- बच्चों को बिना विशेषज्ञ की सलाह के न दें।
- अधिक मात्रा लेने से उल्टी, दस्त और कमजोरी हो सकती है।
- इसका उपयोग हमेशा किसी आयुर्वेदाचार्य की सलाह से ही करें।
निष्कर्ष
बकाइन (Bakain) का पौधा आयुर्वेद में अनेक औषधीय गुणों से भरपूर माना गया है। यह कृमि रोग, त्वचा रोग, बुखार, गठिया और पाचन समस्याओं में लाभकारी है। हालाँकि, इसकी विषैली प्रकृति के कारण इसे हमेशा सीमित मात्रा और विशेषज्ञ की देखरेख में ही इस्तेमाल करना चाहिए। सही विधि से उपयोग करने पर यह पौधा स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी साबित हो सकता है।